तमनार में 19 मई को जनसुनवाई : SECL की पेलमा खदान का भारी विरोध, पर्दे के पीछे अडाणी ग्रुप और एक बार फिर उजड़ेंगे कई गांव, जंगल और लोकल इकोसिस्टम… PESA कानून के उल्लंघन का आरोप..

रायगढ़ : जिले के तमनार ब्लॉक में एक बार फिर औद्योगिक विकास और जल-जंगल-जमीन बचाने की लड़ाई आमने-सामने है। आगामी 19 मई को तमनार में एसईसीएल (SECL – South Eastern Coalfields Limited) की प्रस्तावित ‘पेलमा ओपन कास्ट कोल माइन’ परियोजना को लेकर पर्यावरण जनसुनवाई होने जा रही है। लेकिन इस जनसुनवाई से पहले ही पूरे क्षेत्र में भारी आक्रोश और तनाव का माहौल है। पिछले साल नवम्बर और दिसंबर महीने में तमनार में जिंदल के खदान को लेकर भारी विरोध देखने को मिला था।
इसके साथ ही ग्रामीणों और शहरी लोगो का आरोप है कि सरकारी कंपनी की आड़ में यह पूरा प्रोजेक्ट निजी हाथों में सौंपा जा चुका है और इसके लिए बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई और गांवों का विस्थापन किया जाएगा।
क्या है पेलमा ओपन कास्ट माइन प्रोजेक्ट?दस्तावेजों के अनुसार, SECL की इस खुली खदान की कुल उत्पादन क्षमता 15 मिलियन टन प्रति वर्ष (15 MTPA) तय की गई है। यह एक विशालकाय प्रोजेक्ट है, जिसका कुल दायरा लगभग 2077 हेक्टेयर में फैला होगा। कोयला निकालने के लिए इस क्षेत्र के बड़े हिस्से का अधिग्रहण किया जाना है।
परियोजना का खौफनाक दायरा: 362 हेक्टेयर जंगल की होगी कटाई
इस प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा और विनाशकारी प्रभाव पर्यावरण पर पड़ने वाला है। पर्यावरण मंजूरी (EC) और ‘एनवायर्नमेंटल इम्पैक्ट असेसमेंट’ (EIA) रिपोर्ट के मुताबिक, इस खदान को विकसित करने के लिए करीब 362 हेक्टेयर के घने जंगलों को काटा जाएगा। क्षेत्र में पहले से ही कोयला खदानों और राखड़ (Fly Ash) के कारण प्रदूषण चरम पर है, आलम यह है कि ३० किलोमीटर दूर रायगढ़ की घरो की छत और फर्श में भी काले डस्ट पाए जाते है! ऐसे में इतनी बड़ी मात्रा में जंगल कटने से स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह तबाह होने की पूरी आशंका है।
क्या है इस खदान का अडाणी कनेक्शन?
स्थानीय ग्रामीणों के विरोध की सबसे बड़ी वजह इस प्रोजेक्ट में अडाणी ग्रुप की एंट्री है। भारत सरकार के कोयला मंत्रालय (Ministry of Coal) और SECL की अगस्त 2023 की आधिकारिक प्रेस रिलीज़ बताती है कि कागजों पर यह खदान केंद्र सरकार की कंपनी SECL की है। लेकिन धरातल पर सच्चाई यह है कि अगस्त 2023 में SECL और कोयला मंत्रालय ने ‘MDO (Mine Developer and Operator) मॉडल’ के तहत इस खदान को चालू करने का एग्रीमेंट अडाणी एंटरप्राइजेज की कंपनी ‘पेलमा कोलियरीज’ (Pelma Collieries) के साथ किया है।

इस एग्रीमेंट के तहत अगले 20 सालों तक खदान की डिजाइनिंग, फाइनेंसिंग, निर्माण, कोयला उत्खनन और मेंटेनेंस की पूरी जिम्मेदारी अडाणी ग्रुप के पास ही रहेगी। ग्रामीणों का आरोप है कि SECL केवल एक मुखौटा है, और असल मुनाफा निजी कंपनी कमाएगी, जबकि नुकसान तमनार और रायगढ़ की जनता को भुगतना पड़ेगा। यह MDO मॉडल के तहत किसी निजी कंपनी को सौंपी गई छत्तीसगढ़ की पहली ओपनकास्ट खदान है।
ये गांव होंगे सबसे ज्यादा प्रभावित, मंडरा रहा है विस्थापन का खतरा
इस प्रोजेक्ट के कारण तमनार ब्लॉक के कई गांव सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। खदान, ओबी डंप (OB Dump) और कोयला परिवहन के इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए मुख्य रूप से 9 गांवों की जमीन अधिग्रहित की जा रही है, जिनमें शामिल हैं:
पेलमा
उरबा
मदुवाडुमर
लालपुर
हिंझर
जरहीडीह
साकता
मिलुपारा
खर्रा
इनमें से कई गांवों पर पूर्ण विस्थापन का खतरा मंडरा रहा है, जिससे पीढ़ियों से यहां रह रहे आदिवासी और ग्रामीण अपनी आजीविका खोने के डर से दहशत में हैं।
पेसा (PESA) कानून की अनदेखी का आरोप
पेलमा और इसके आसपास के कई गांव पेसा कानून (PESA Act) के अंतर्गत आते हैं। संविधान के इस प्रावधान के तहत आदिवासी क्षेत्रों में किसी भी भूमि अधिग्रहण या प्रोजेक्ट के लिए ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य है। लेकिन स्थानीय कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि प्रशासन ग्रामसभाओं के अधिकारों को दरकिनार कर रहा है। इसी के तहत घरघोड़ा से पेलमा तक कोयला ढोने के लिए बिछाई जा रही नई रेलवे लाइन का भी भारी विरोध हो रहा है।
औद्योगिक घरानों के खिलाफ कड़े आंदोलनों का इतिहास
तमनार का इतिहास औद्योगिक घरानों के खिलाफ कड़े आंदोलनों का रहा है। हाल ही में इसी इलाके में अडाणी और जिंदल के अन्य कोल ब्लॉक प्रोजेक्ट्स (जैसे गारे-पेलमा) को लेकर भारी विरोध और हिंसक झड़पें हो चुकी हैं, जिसके कारण या तो जनसुनवाइयां रद्द करनी पड़ी, या गुपचुप तरीके से सफल करनी पड़ी। जल, जंगल और जमीन छिनने के खौफ और पुरानी घटनाओं को देखते हुए, 19 मई को होने वाली यह जनसुनवाई जिला प्रशासन और पुलिस-प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाली है। क्या यह जनसुनवाई शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो पाएगी, या तमनार एक बार फिर एक बड़े जन-आंदोलन का गवाह बनेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
19 मई को होने वाली यह जनसुनवाई सिर्फ उन चंद गांवों के किसानों की लड़ाई नहीं है, जिनकी जमीनें छिनने वाली हैं। यह रायगढ़ के हर उस नागरिक की लड़ाई है, जो आज प्रदूषण की मार झेल रहा है। कोयले की कालिख, उड़ती राख, कैंसर जैसी बीमारियां और सूखता भूजल.. यह सब इन्हीं ‘सफल जनसुनवाइयों’ का नतीजा है।
रायगढ़ की जनता को यह समझना होगा कि अगर आज हम अपने कमरों में एसी चलाकर यह सोच रहे हैं कि “हमारी जमीन थोड़ी जा रही है”, तो याद रखिए… जमीन उनकी जा रही है, लेकिन उस खदान से उड़ने वाला जहर कल आपके बच्चों की सांसों में घुलेगा। 19 मई को सिर्फ एक कंपनी का प्रोजेक्ट पास नहीं होगा, बल्कि रायगढ़ के भविष्य के ताबूत में एक और कील ठोंकी जाएगी।




